भारतीय उद्योग जगत के पितामह, कर्मयोगी, जमशेदजी टाटा

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Fri, 22 Nov, 2019 10:40 AM IST

भारतीय औद्योगिक जगत के युगपुरुष जमशेद नौशेरवाँ जी टाटा का जन्म ३ मार्च १८३९ ई. को नवसारी में पारसी पुरोहितों के परिवार में हुआ था। टाटा परिवार पौरोहित्य कर्म से जुड़ा हुआ था। आपको भारतीय उद्योग जगत का जनक कहा जाता है। आपका बचपन नवसारी में ही व्यतीत हुआ। जब आपकी उम्र मात्र १३ वर्ष की थी, उसी समय आपके पिता ने बम्बई में निर्यात व्यवसाय शुरू किया। जमशेद जी १४ वर्ष की उम्र में बम्बई आए। पारसी सम्प्रदाय की स्थापित एवं मान्य परम्परा के अनुसार १६ वर्ष की अवस्था में आपका विवाह हीराबाई (१० वर्ष) के साथ हो गया। आपके पिता नौशेरवाँ जी ने उच्च शिक्षा प्रदान कराने हेतु १७ वर्ष की उम्र में आपका प्रवेश 9एलफिन्सटन कॉलेज“ में कराया। कुछ ही वर्षों के पश्चात 9ग्रीन स्कॉलर“ के रुप में आपकी कॉलेज की शिक्षा पूर्ण हो गयी। आप साहित्य एवं पुस्तकों के अतिशय प्रेमी थे।

आपकी शिक्षा सुसम्पन्न होने के पश्चात्‌ पिता नौशेरवाँ जी टाटा ने आपको व्यावसायिक कार्यों में शामिल कर लिया और व्यावसायिक बारीकियाें से अवगत कराना आरंभ कर दिया।
पिता के भेजने पर आप १८५९ ई. में एक व्यापारिक यात्रा पर हाँगकाँग गये। वहाँ पर आपने एक पारिवारिक फर्म की शाखा खोली। वहाँ आप १८६३ तक रहे।

औद्योगिक क्षेत्र में बढ़ाए कदम

मात्र २१,०००/- रुपये की पूँजी से आपने १९६८ ई. में एक निजी व्यापारिक फर्म की शुरुवात की। उस समय जमशेद जी की उम्र मात्र २९ वर्ष थी। उस फर्म के माध्यम से आपने तथा आपके साथियों ने विदेशों से कुछ सैनिक साजो-सामान की आपूर्ति का ठेका हासिल किया। इस ठेके में लाभांश पर्याप्त था, जिससे उन्हें टेक्सटाईल्स के क्षेत्र में अपना व्यवसाय शुरू करने हेतु दिशा और स्थिति प्राप्त हुई। १८६९ में आपने कुछ साथियों के साथ हिस्सेदारी में एक पुरानी तेल मिल खरीदी और उसे वस्त्र निर्माण हेतु कारखाने में तब्दील कर दिया। आपने इसके प्रबंधन की कमान खुद संभाली और कुछ ही वर्षों में उसे एक चालू कारखाने के स्वरूप में बदल दिया। उस कारखाने का नाम एलेक्जेन्ड्रा कॉटन, था जिसे बाद में उन्होंने लाभ पर एक वस्त्र व्यवसायी के हाथों बेंच दिया। १८७२ में आप एक बार फिर इंग्लैण्ड गये।

इस यात्रा का उद्देश्य वहाँ के उद्योगों का अध्ययन और खासकर लंकाशायर स्थित वस्त्र व्यवसाय का अध्ययन था। १५ लाख रूपये की पूँजी से आपने द सेंट्रल इण्डिया स्पिनिंग वीविंग एण्ड मैन्युफैक्चरिंग कम्पनी शुरू की। इसमें आपके अलावा आपके मित्रों की भी पूँजी लगी हुई थी। १८७७ में पहली जनवरी को क्वीन विक्टोरिया को भारत की रानी घोषित किये जाने पर नागपुर में एंपैरस मिल का श्री गणेश हुआ। नागपुर की सूत कपड़ा मिल ने आपके लिए एक प्रयोग शाला की भूमिका निभाई। यहाँ आपको इसकी हरेक बारीकियों पर ध्यान देने का अवसर मिला। उस समय की सबसे उन्नत अमेरिकी संयंत्र प्रस्थापित करके वस्त्र की गुणवत्ता में काफी सुधार सुनिश्चित किया गया। १८८६ में उन्होंने पेंशन फण्ड तथा आगे चलकर १८९५ में दुर्घटना क्षतिपूर्ति जैसी नवीन शुरूआतें की। इस प्रकार इन कदमों से वे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से बहुत आगे निकल गये। आपने, जीवन में व्यावसायिक चुनौतियों एवं संघर्षों को सदैव सहर्ष स्वीकार किया। १८८६ आपने एक बीमार मिल को खरीदकर उसे स्वस्थ स्वरूप देने की चुनौती को सफलतापूर्वक पूरा किया। उक्त मिल को स्वदेशी आन्दोलन की भावना के अनुसार स्वदेशी कॉटन मिल नाम दिया गया। यह कम्पनी मुख्यतया भारतीय शेयर होल्डर्स द्वारा समर्थन प्राप्त थी। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक इसमें अपने रूपये लगाए। परन्तु दो वर्ष बाद प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनी और मिल का लाभांश भी नहीं घोषित हो पाया। कुछ कारणों तथा अफवाहों के कारण शेयर्स के मूल्य गिर गये। टाटा का यशस्वी नाम, उसकी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी थी। ऐसे में जब बैंकों ने भी ऋण देने से इन्कार कर दिया तो कर्मयोगी जमशेद जी ने पारिवारिक ट्रस्ट एवं एंपैरस मिल के कुछ शेयरों की बिक्री कर पूँजी की व्यवस्था की तथा स्वदेशी कॉटन मिल में इकट्ठा की गयी सारी पूँजी लगा दी। इस कवायद का अपेक्षित प्रभाव पड़ा और शेयर्स के मूल्य बढ़ गये। अपने कर्मठ प्रयासों से कुछ ही वर्षों में आपने स्वदेशी
कॉटन मिल को एक उत्तम श्रेणी की कॉटन मिल के रूप में स्थापित कर दिया।

जल्द ही स्वदेशी कॉटन मिल में बनने वाले कपड़ों का निर्यात जापान, कोरिया, चीन तथा महत्वपूर्ण देशों में होने लगा।

लौह एवं इस्पात उद्योग में बढ़ाए कदम

१९०१ में जमशेद जी ने अपने कदम भारतीय इस्पात उद्योग की तरफ बढ़ाए। यह उद्योग उस समय आरम्भिक अवस्था में था। उस समय इस उद्योग में बहुत ही कम उत्पादन होता था। इस कार्य हेतु जमशेद जी ने अंग्रेजी और अमेरिकी सर्वेक्षकों का सहयोग लिया। तकनीकी परामर्श तथा इस्पात निर्माण प्रक्रिया की सुव्यवस्थित जानकारी के लिए आपने यूरोपीय देशों तथा अमेरिका की यात्रा किया। आप व्यापक स्तर पर लौहशोधन का कार्य करना चाह रहे थे, इसलिए उक्त परियोजना पर आपने विपुल राशि का निवेश किया। आपकी यह महत्वाकांक्षी परियोजना मूर्तरूप लेने के पूर्व ही सन्‌ १९०४ में जर्मनी में इस कर्मयोगी की संसार से विदाई हो गयी, जमशेद जी ने अपनी देह त्याग दी, उनकी मृत्यु हो गयी। जमशेद जी की विरासत को संभालने हेतु उनके दो पुत्र क्रमशः दोराब जी तथा रतन और उनके चचेरे भाई आर. डी. टाटा मौजूद थे। अन्तिम दिनों में जमशेद जी ने चचेरे भाई आर. डी. टाटा, अपने पुत्रों तथा अपने निकट के सम्बधियों से अपनी इच्छा प्रकट करते हुए कहा था कि वे उनके द्वारा शुरू किये गये कामों को आगे बढ़ाएँ। यदि ऐसा न कर सकें तो कम से कम अब तक किये गये कार्यों को सुरक्षित रखें।
१९०७ में जमशेद जी के सपनों को मूर्तरूप दिया जा सका। कलकत्ता से १५० मील पश्चिम में साकची में टाटा आयरन एण्ड स्टील कम्पनी की स्थापना हुई। कम्पनी का तीव्र गति से विकास हुआ। १६ फरवरी, १९१२ को खुशी के वातावरण में साकची प्लांट से पहले इस्पात पिंड का उत्पादन हुआ। सम्प्रति, यह देश की एक प्रमुख इस्पात कम्पनी के रूप में प्रतिष्ठित है।

देश की शान ताज महल होटल का निर्माण

दूरद्रष्टा, कर्मयोगी जमशेद जी टाटा ने भारत के सर्वोत्तम होटल ताजमहल का निर्माण किया। ताजमहल मुम्बई में स्थित है। ताजमहल के निर्माण में एक बड़ी घनराशि खर्च हुई। ताजमहल के निर्माण में उनका उद्देश्य था भारत में यात्रियों को आकर्षित करना तथा पर्यटन को बढ़ावा देना। अपनी विभिन्न यात्राओं के दौरान आपने स्वयं ताजमहल की साजसज्जा का सामान खरीदा था।

ताजमहल का उद्‌घाटन १९०३ ई. में हुआ था। ताज अपने जमाने का पहला भवन था जो विद्युत से प्रकाशमान था। आज तो ताज की शान ही निराली है। उस समय भी ताजमहल में वे सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं जो विश्व के जाने-माने होटलों में उपलब्ध थीं।
जमशेद जी के परोपकारी सद्‌कार्य

आप में जनसेवा और परोपकार की भावना तथा संस्कार कूट-कूट कर भरे हुए थे। जनकल्याण की भावना से ही आपने १८९२ में जे. एन. ट्रस्ट की स्थापना की। आपने उच्च शिक्षा के लिए फंड का इंतजाम किया। आपने ट्रस्ट के माध्यम से ३ योग्य विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से विदेश भेजना शुरू किया। इस योजना के अन्तर्गत भारत के अनेक आरम्भिक इंजीनियर, सर्जन, फिजीशियन, बैरिष्टर तथा आई. सी. एस. अधिकारी लाभ प्राप्त किये।

सन्‌ १८९८ में अपने अपने चौदह भवन, एक बड़ी धनराशि और चार भौमिक सम्पत्तियाँ पोष्ट गे्रजुएट इन्स्टीट्यूट फॉर साइंटफिक रिसर्च की स्थापना के लिए पेश की। हालांकि, ब्रिटिश गवर्नमेंट की हीला-हवाली की वजह से उनका यह सपना उनके जीवन काल में पूरा नहीं हो सका, लेकिन उनके निधन के पश्चात्‌ उनके पुत्रों ने इसे पूर्ण किया।

इस प्रकार १९११ में बंगलौर में इस संस्थान की स्थापना हुई, जो टाटा, भारत सरकार तथा मैसूर सरकार का सम्मिलित सहकार था। आरम्भ में मात्र इसमें तीन बड़े विभाग जनरल एण्ड एम्प्लाइड कैमिस्ट्री, इलेक्ट्रो टेक्नोलोजी कैमेस्ट्री एण्ड आर्गेनिक कैमिस्ट्री थी। कालान्तर में इसमें अन्य नये विभाग जुडत़े गये।

इण्डियन इन्स्टीट्यूट, बंगलोर ने टाटा स्टील, जमशेदपुर की भांति ऐसे केन्द्र के रूप में कार्य किया कि जिससे बाद में अनेक अन्य शाखाओं-सेंट्रल फूड एण्ड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इन्स्टिटयूट, मैसूर, लाख रिसर्च इन्स्टीट्यूट, रांची, नेशनल एटोनॉटिकल लैबोरेटरी, बंगलोर का प्रादुर्भाव हुआ। इसके द्वारा अनेक अन्य संस्थानों की स्थापना एवं विकास का कार्य सम्पन्न हुआ।

दूरदर्शी एवं नवोन्मेषी व्यक्तित्व जमशेद जी

जमशेद जी को एक कर्मयोगी, दूरदर्शी एवं नवोन्मेषी व्यक्तित्व के रूप में सदैव स्मरण किया जाएगा। उन्होंने अपने व्यक्तित्व के उपरोक्त सद्‌गुणों का सदुपयोग न केवल अपने घराने के औद्योगिक विकास के लिए किया बल्कि राष्ट्र के विकास एवं उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नवीनता उनके जीवन की एक शैली बन गयी थी। बग्घी में रबर टायर का प्रयोग करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। बंबई में वे पहले आटोमोबाइल चालक थे। आपने अपने जीवन में जरूरी कार्यों के लिए दिल खोलकर दान दिए। वे अत्यंत उदार और परोपकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे। जमशेद जी का व्यक्तित्व उच्चतम मानवीय आदर्शों का परिचायक था। श्रमिकों की सुविधाओं एवं उनके कल्याण के लिए आपने नवीन व्यवस्थाएँ की और नये कायदे लागू किये जो उस समय किसी की कल्पना से भी परे था। दुनिया के तमाम देशों में इस तरह के सुधार दशकों बाद आए। भारत में उनके प्रति आज भी अत्यंत आदर व सम्मान का भाव है। देश उनके प्रति कृतज्ञता के भाव से भावित है। १९६५ में भारत सरकार के डाक एवं तार विभाग द्वारा उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया। उन्हें प्रदत्त यह सम्मान देश में औद्योगिकीकरण के लिए उनके पुरुषार्थ के प्रति देश की कृतज्ञता का द्योतक है।

दूरदर्शी एवं कर्मवीर जमशेदजी टाटा को सादर नमन्‌।

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