उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत और योगी सरकार

राज्य सरकार ने भी अयोध्या को केंद्र में रखकर अनेक विकास योजनाएँ निर्मित की हैं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस में काशी विश्वनाथ कॉरीडोर का निर्माण इसी निरंतरता का एक पक्ष है।

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उत्तर प्रदेश इसलिए खास है क्योंकि यह कई महत्त्वपूर्ण सनातन प्रतीकों का केंद्र है। आस्थावान सनातन धर्मियों के लिए यहाँ अयोध्या, काशी और मथुरा है। कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश हिंदू संस्कृति की त्रिवेणी है।

नामकरण की प्रवृत्ति किसी एकल प्रक्रिया का उत्पाद न होकर अलग-अलग ऐतिहासिक कृत्यों के विरुद्ध प्रतिक्रिया है।

ृ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो पूरे नैतिक बल के साथ नामकरण जैसे बदलावों को मूर्त रूप प्रदान कर रहे हैं।

किसी भी भू-भाग के शासक के मूल्यांकन का एक आधार यह भी होता है कि वो स्थानीय संस्कृति के कितना अनुकूल है। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध भू-भाग के लिये तो यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इसलिये आवश्यक ही है कि योगी आदित्यनाथ को भी इस कसौटी पर परखा जाए कि वो उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के कितने समीप हैं। खासकर, इस संदर्भ में कि जिस सनातन विरासत को लेकर भारतीय जनता पार्टी अपना दावा जताती है, उसको लेकर उसके मुख्यमंत्री कितने सजग हैं, यह गौर करने वाली बात है।

सनातन की त्रिवेणी

वस्तुतः उत्तर प्रदेश इसलिए खास है क्योंकि यह कई महत्त्वपूर्ण सनातन प्रतीकों का केंद्र है। आस्थावान सनातनियों के लिए यहाँ काशी है जो एक अक्खड़ किंतु उल्लासपूर्ण जीवन शैली का पर्याय है तो मृत्यु के प्रति सहज जीवन-बोध का प्रतीक भी। भगवान शिव की इस नगरी को सनातन धर्म का निचोड़ कहा जा सकता है। फिर इसी उत्तर प्रदेश में अयोध्या भी है। अयोध्या यानी भगवान राम की नगरी। सनातन परंपरा में मर्यादा का चरम जिस व्यक्तित्व में मिलता है, वो हैं राम। अयोध्या भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता का एक अनूठा और गौरवशाली केंद्र रहा है। इसके साथ ही देखें तो सनातन धर्म के एक और अवतार भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा भी उत्तर प्रदेश में ही है। कह सकते हैं कि उत्तर प्रदेश हिंदू संस्कृति की त्रिवेणी है।

वस्तुतः उत्तरप्रदेश की इस सांस्कृतिक समृद्धि का भारतीय पहचान को व्याख्यायित करने में बहुत कम उपयोग होता रहा है। जिस सेकुलर विचार के नाम पर भारतीय मानस को परिभाषित करने की कोशिश होती रही, उसमें अयोध्या, काशी और मथुरा कहीं नहीं थी। इसे नितांत निजी धार्मिक प्रतीक मानकर भारतीयता की परिभाषा से विलग कर दिया गया था, जबकि दूसरे अन्य प्रतीक गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर प्रश्रय पाते रहे। इस स्थिति में आमूल बदलाव तब आया जब २०१४ में केंद्र की सरकार बदली और पॉंच साल पहले उत्तर प्रदेश की सत्ता भी बदली। यहाँ से एक भारतीय के रूप में हम कौन हैं की खोज का नया अध्याय शुरू हुआ। और यह कोई प्रतिगामी, आक्रामक और विरोधी न होकर आस्थावान, विनम्र और निष्ठावान है। कुछ उदाहरणों के माध्यम से इसे देखते हैं। हालाँकि, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से तय हुआ किंतु जिस प्रकार प्रधानमंत्री मोदी ने इसमें सक्रियता दिखाई, शिलान्यास कार्यक्रम में शामिल हुए और सनातनी वेशभूषा धारण की, उससे यह भाव प्रत्यक्ष हुआ कि अब शासन के लिए आदर्श-नागरिक होने की अर्हता गैर-हिंदू व्यवहार नहीं रहा। इसके अलावा राज्य सरकार ने भी अयोध्या को केंद्र में रखकर अनेक विकास योजनाएँ निर्मित की हैं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस में काशी विश्वनाथ कॉरीडोर का निर्माण इसी निरंतरता का एक पक्ष है। ऐतिहासिक निरंतरता को नकारात्मक रूप से प्रभावित किये बिना सांस्कृतिक निष्ठा के भौतिक स्वरूप को आधुनिक समय के अनुकूलन करना ही काशी कॉरीडोर के मूल में रहा है। निश्चित ही यह भी दर्शाता है कि कैसे शासन सनातन परंपरा की परिधि में अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति कर रहा है। मथुरा के लिए तीर्थ विकास परिषद के गठन को भी इसकी निरंतरता में शामिल किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त संस्कृति प्रेरित शहरी विकास का नियोजन, शहरों/ जगहों के नाम परिवर्तन तथा धार्मिक स्थलों को केंद्र में रखकर अवसंरचना विकास जैसे अनेक उदाहरणों की चर्चा की जा सकती है। इन सभी उदाहरणों का निष्कर्ष यही है कि उत्तर प्रदेश जिस सनातन समृद्धि को धारण करता है, उसे अखिल भारतीय पहचान प्रदान करने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है।

संस्कृति अनुकूल नामकरण

इलाहाबाद शहर का नाम प्रयागराज करना हो, मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नामांतरण पं. दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर करना हो या फिर फैजाबाद स्टेशन का अयोध्या, इन प्रयासों का एक वर्ग हमेशा-हमेशा से विरोध करता आया है कि इसका औचित्य क्या है? तो आइये! इसके औचित्य को समझते हैं कि क्यों सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिये ऐसा करना अनिवार्य ही है। अंततः यह संस्कृति ही है जिसमें राष्ट्र का प्राण बसता है।

नाम में क्या रखा है। अगर हम गुलाब को किसी अन्य नाम से भी पुकारेंगे तो उसकी खुशबू कम नहीं होगी। जूलियट के हवाले से कही गई शेक्सपियर की यह बात उस संदर्भ में तो प्रतीक प्रतीत होती है जब गुण के सामने नाम के महत्त्व को गौण करने का औचित्य सिद्ध करना हो लेकिन यह उक्ति अपनी पहचान में रूढ़ हो चुके किसी नाम के ऐतिहासिक संदर्भ की अवहेलना भी करता है। खासकर यह नाम किसी शहर का हो तो उस नाम का अपना एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक संदर्भ होता है, जिससे विलग उसकी पहचान नहीं की जा सकती। और यह ऐतिहासिक सांस्कृतिक संदर्भ एक प्रतीक के रूप में राजनीतिक महत्त्व भी रखता है। दरअसल, शहर भौतिक उपस्थितियों का समुच्चय भर नहीं होता बल्कि यह उस विशिष्ट संस्कृति का द्योतक भी होता है जो समय के साथ वहाँ विकसित होती है। इस प्रकार एक शहर की पहचान उसके सभ्यताई विकास और सांस्कृतिक विशेषता, दोनों के साथ रूढ़ हो जाती है और यही वजह है कि जैसे ही किसी शहर का नाम हम सुनते हैं तो उसकी एक स्पष्ट तस्वीर हमारे आँखों के सामने उभर आती है। मसलन, नालंदा का नाम सुनते ही शिक्षा के एक केंद्र के रूप में उसकी पहचान उभर जाती है तो बनारसी शब्द एक मनमौजी संस्कृति को निरूपित करता है। ऐसे ही अन्य शहरों या प्रतिष्ठानों के साथ भी होता है। लेकिन, क्या हो अगर  किसी राष्ट्र को उसकी ऐतिहासिकता से विलग कर दिया जाए? उसके सांस्कृतिक पहचान को शिथिल करने की कोशिश की जाए? या फिर उसे नई पहचान के साथ गढ़ने की कोशिश की जाए? इन सभी प्रयासों का एक ही परिणाम होगा कि नागरिक चेतना सांस्कृतिक निरंतरता से भिन्न हो जाएगी। ऐसा ना हो इसलिए आवश्यक है कि ऐसे प्रतीकों के संरक्षण का प्रयास हो। नामांतरण की कोशिश को भी इसी सन्दर्भ में देखने की ज़रूरत है।

वस्तुतः अतीत के अन्याय को समाप्त कर या यूँ कहें कि इस अन्याय को आधार मानकर वर्तमान में प्राचीन-ऐतिहासिक स्मृतियों के निर्माण की प्रवृत्ति वैश्विक है। अक्सर देश या शहरों के नाम ऐसे ही अन्यायपूर्ण स्मृतियों को जताते हैं, जिन्हें वर्तमान सरकार द्वारा बदलकर ऐतिहासिक गलतियों को ठीक करने की कोशिश की जाती है। ऐतिहासिक अन्याय की निर्मिति के पीछे कई वजहें हैं। जब किसी देश पर लंबे समय तक औपनिवेशिक सत्ता कायम रहती है तो वह स्थानीय पहचान और अस्मिता को दरकिनार करते हुए देश/शहरों पर अपने अनुकूल नाम थोप देती है। इसी प्रकार यदि शासक वर्ग और शासित वर्ग के बीच धार्मिक अंतर मजब़ूत हो और यह धार्मिक अंतर शासन को आधार भी प्रदान करता हो तो कालांतर में शासित वर्ग द्वारा उस दौर की घटनाओं को धार्मिक अन्याय के रूप में चिह्नित किया जाने लगता है। फिर कई जगहों पर देशज जातियों को समाप्त कर दिया जाता है तो उसके विरुद्ध भी प्रतिक्रिया होती है। दुनिया भर में इन्हीं आधारों पर ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने का प्रयास किया जाता है।

औपनिवेशिक गलतियों को ठीक करने की कोशिशों को देखें तो भारत में ही बॉम्बे, कलकत्ता और मद्रास जैसे नामों को बदला गया। इसी प्रकार आज़ादी के पूर्व  जिम्बॉबे देश का नाम रोडेशिया था जो ब्रिटिश साउथ अफ्रीका कंपनी के सेसिल रोड्‌स के नाम पर रखा गया था। औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाते ही जिम्बाबे ने औपनिवेशिक नाम भी बदल लिया। सीलोन से श्रीलंका, वर्मा से म्याँमार, सियाम से थाईलैंड इत्यादि ऐसे ही परिवर्तित नाम हैं जो औपनिवेशिक पहचान त्यागने के उद्देश्य से बदले गए। कुछ नाम इसलिये बदले गए क्योंकि वे स्थानीय संस्कृति को ठीक प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। उदाहरण के लिये तुर्की का कुस्तुनतुनिया शहर जो एक ईसाई कॉन्स्टेनटाइन के नाम पर था उसे इस्लामी चरित्र के अनुरूप बदलकर इस्ताम्बुल कर दिया गया। बॉयटॉन (ँब्ूदैह) और यॉर्क (भ्दीव्) से परिवर्तित होकर क्रमशः ओटावा और टोरंटो बने कनाडाई शहरों के पीछे भी यही धारणा थी कि पुराने नाम देशज संस्कृतियों का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। कुछ देशों में वैचारिक क्रांति के कारण भी नाम बदले जाते हैं। उदाहरण के लिये, रूस में साम्यवादी क्रांति संपन्न होने के बाद साम्यवादी नेताओं के नाम पर लेनिनग्राद और स्टालिनग्राद जैसे शहर बनाए किंतु १९९० के दशक में जब सोवियत संघ का पतन हुआ तो पुनः लेनिनग्राद को सेंट पीटर्सबर्ग और स्टालिनग्राद को वोल्गोग्राद कर दिया गया। सिर्फ शहरों ही नहीं बल्कि सडक़, हवाई अड्डे, पहाड़ इत्यादि के भी नाम भी बदले जाते रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका में तो बाकायदा दक्षिण अफ्रीका ज्योग्राफिकल नेम काउंसिल नामक आयोग ही बना है जो नामकरण को सांस्थानिक रूप प्रदान करता है ।

ऐसे अलग-अलग उदाहरणों के उल्लेख का एकमात्र उद्देश्य यह स्पष्ट करना था कि नामकरण की प्रवृत्ति किसी एकल प्रक्रिया का उत्पाद न होकर अलग-अलग ऐतिहासिक कृत्यों के विरुद्ध प्रतिक्रिया है। परंतु इन सबके मूल में जो एक बात रेखांकित करने वाली है वह यह कि लगभग हर मामले में राष्ट्रीय भावना तथा सांस्कृतिक अनुराग इन परिवर्तनों के सबसे प्रभावी कारकों में रहा है। जब कोई राष्ट्र सचेत रूप से यह महसूस करने लगता है कि अतीत के किसी हिस्से में बाह्य हस्तक्षेप के द्वारा उसकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक निरंतरता भंग हुई थी तो वह निश्चित ही उसे दोबारा पाने की कोशिश करता है। भारतीय संदर्भ में भी नामांतरण के पीछे यही तत्त्व सर्वाधिक प्रभावी है। खासकर जब से केंद्र में वर्तमान सरकार अस्तित्व में आई है ऐसे प्रतीकों के प्रति सजगता बढ़ी है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तो पूरे नैतिक बल के साथ ऐसे बदलाव को मूर्त रूप प्रदान कर रहे हैं। नामांतरण के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि आज भी देश के कई हिस्सों में शहरों/रेलवे स्टेशनों आदि के नाम उन आंक्राताओं के नाम पर हैं जिसने वहाँ के वैभव को नष्ट करने का काम किया था। बिहार के बख्तियारपुर से अच्छा उदाहरण और क्या होगा! जिस बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को जला दिया था उसके नाम पर आज वह जगह जानी जाती है। आखिर इससे हम संस्कृति और इतिहास के किस पक्ष को लेकर आगे बढऩा चाहते हैं। ऐसी कोशिशों का एक साफ मकसद दिखाई देता है कि एक पराजित राष्ट्र की स्मृति को इस तरह वैधता देना कि नागरिक बोध स्वयं ही नई ऐतिहासिकता को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाए। यह कोशिश सफल न हो इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी विरासत, अपनी संस्कृति की ओर लौटें। इन्हें फिर से पाने के हर संभव प्रयास करें। नामांतरण ऐसा ही एक प्रयास है। ऐसे और प्रयास करने होंगे।

(लेखक सामाजिक-राजनीतिक चिंतक

एवं पूर्व आईआरएस अधिकारी हैं)

 

 

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