वैश्विक पटल पर भारतीयता की छाप छोड़ते प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में केवल कूटनीतिक प्रवाह नहीं है अपितु उनकी विदेश नीति का आधार सांस्कृतिक संबंध भी है, जिसके मूल में विद्यमान है हमारा वसुधैव कुटुम्बकम्‌ का मूल मंत्र।

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भारत इकलौता ऐसा देश है, जो क्वाड और ब्रिक्स दोनों समूहों का हिस्सा है। आज भारत, रूस और अमेरिका दोनों शक्तियों से अपनी शर्त पर बात करता है।

केंद्र की सत्ता में काबिज़ हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नौ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस दौरान देश विकास की राह पर सरपट आगे बढ़ रहा है। आर्थिक मोर्चे से लेकर विदेश-नीति तक हर मुद्दे पर देश सशक्त और मज़बूत बन रहा है। अंत्योदय से भारत उदय का मंत्र आज साकार होता हुआ दिखाई दे रहा है। हमारे नायकों ने जो सपना आज़ादी की लड़ाई के दरमियान या उसके बाद के वर्षों में संजोया था। वह अब फलीभूत हो रहा है। आज विश्व पटल के अनगिनत देश भारत की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं। भारत, विश्व का नेतृत्व करने की दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में तीव्र गति से आगे बढ़ रहा है। दुनिया के शक्तिशाली देशों में शुमार अमेरिका और अन्य राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष हमारे प्रधानमंत्री की तारीफ़ करते नहीं अघाते। यह भारत और भारतीयता के लिए गौरवांवित करने वाला पल है। दुनिया आज हमारे प्रधानमंत्री को सुनने एवं उनके सानिध्य में आगे बढ़ने को उतावली है। विश्व के नेताओं ने यह अनुभव किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में केवल कूटनीतिक प्रवाह नहीं है अपितु उनकी विदेश नीति का आधार सांस्कृतिक संबंध भी है, जिसके मूल में विद्यमान है हमारा वसुधैव कुटुम्बकम्‌ का मूल मंत्र। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय की बात हो या वैश्विक महामारी कोरोना के समय की, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कार्यशैली और नेतृत्व क्षमता से कई मौके पर विश्व को आश्चर्यचकित किया है।

विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों के राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष उनका आत्मविश्वास और मानवीय मूल्यों से लबरेज़ व्यक्तित्व उन्हें एक मज़बूत नेता के रूप में विश्व पटल पर स्थापित किया है। निःसन्देह एक समय १८९३ का था, जब एक नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) को सुनकर दुनिया मंत्रमुग्ध हो गई थी और आज दूसरे नरेंद्र (प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास) हैं। जिनकी दूरदृष्टि और विजन से दुनिया काफ़ी प्रभावित है। प्रधानमंत्री जी की दूरदर्शी सोच और देश के प्रति समर्पण ही है कि कोरोना काल जैसी विपरीत परिस्थितियों में हमारा देश अडिग रहा। दुनिया के कई देशों की मदद भी हमने की। चीन की विस्तारवादी नीति का शिकार हमारा देश २०१४ से पूर्व लगातार रहा, लेकिन विगत नौ वर्षों में चीन से डटकर हमने मुकाबला किया है और देश की सीमाओं को अभेद्य बनाया गया है। आंतकवाद कैसे मानवता का विरोधी है भारत ने इसे दुनिया को बताया है, कई वैश्विक मंचो से प्रधानमंत्री ने आतंकवाद पर वैश्विक एकता की बात कही जिसे ज्यादातर देशों ने स्वीकार किया है। आतंकवाद की कमर तोड़ने का काम प्रधानमंत्री मोदी की सरकार में हुआ है।

आज भारत की अपनी एक स्वतंत्र विदेश नीति है और भारत बिना किसी के दवाब में स्वतंत्र रूप से वैश्विक मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करता है। यही वजह है कि नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत कहते हैं, भारत की विदेश नीति बहुत ही गतिशील है। भारत को ये अहम स्थान हमारी क्षमता, खासकर प्रधानमंत्री की दूसरे नेताओं के साथ साझेदारी में काम करने की क्षमता के कारण मिला है। वास्तव में देखा जाए तो विगत कुछ समय में जिस हिसाब से विदेशी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात हुई। जिसमें पापुआ न्यू गिनी के राष्ट्रपति का प्रधानमंत्री का पैर छूना हो या यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की का उम्मीद भरी नजरों से कहना कि रूस-यूक्रेन युद्ध सिर्फ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही रुकवाने में सक्षम है। यह दर्शाता है कि विश्व पटल के राजनेता मुक्तकंठ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं और नरेंद्र मोदी संकटमोचक की स्थिति में दुनिया के सामने खड़े हैं।

पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में भारत आज विश्व में किस तरह आगे बढ़ा है और दुनिया के मानचित्र पर भारत और मोदी की छाप पड़ रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत इकलौता ऐसा देश है, जो क्वाड और ब्रिक्स दोनों समूहों का हिस्सा है। आज भारत, रूस और अमेरिका दोनों शक्तियों से अपनी शर्त पर बात करता है। यह नवपरिवर्तन की व्यापक शुरुआत है। राष्ट्र प्रथम और वसुधैव कुटुम्बकम्‌ दोनों विचारों को एक साथ पुष्पित और पल्लवित करने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगे हुए हैं। एक वक्त था, जब वैश्विक स्तर पर साझा मूल्यों के नाम पर तानाशाही और एकध्रुवीयता का इस्तेमाल किया गया, लेकिन अब यह अतीत की बात बन चुकी है। जिसे अमेरिका और रूस दोनों भी भलीभांति समझ रहें हैं। ऐसे में पश्चिमी देशों के दबाव में न जाकर भारत का लगातार रूस से कच्चा तेल आयात करने से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। व्यापार आज की वैश्विक व्यवस्था में इमोशन से नहीं मांग-आपूर्ति के बीच सम्बंध और दो देशों के अपने-अपने राष्ट्रीय हित पर निर्भर कर रहा है। रूस- यूक्रेन युद्ध के बीच रूस को खरीददार चाहिए था तो भारत को सस्ता कच्चा तेल। तभी तो भारत, रूस-यूक्रेन युद्ध के दरमियान भी रूस और पश्चिमी देशों दोनों से व्यापार करता रहा।

यहां भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर का एक बयान काफी मायने रखता है। जिसमें वो कहते हैं कि, आप भारत के तेल खरीदने से चिंतित हैं लेकिन यूरोप रूस से जितना तेल एक दोपहर में खरीदता है, उतना भारत एक महीने में भी नहीं खरीदता है। दरअसल यह बात विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उस समय कही, जब अप्रैल २०२२ में वो

वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के साथ पत्रकारों के सवालों का जवाब दे रहे थे। भारत वर्तमान में, चीन और रूस की अगुआई वाले ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) और आरआईसी में भी है और अमेरिका,

ऑस्ट्रेलिया, जापान के साथ क्वॉड गुट में भी। रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी का यूएन में कहना कि यह समय युद्ध का नहीं है। इसके अलावा जून २०२२ में ही विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह कहना कि यूरोप को उस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि उसकी समस्याएं पूरी दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्या, यूरोप की समस्या नहीं है। ये दोनों वक्तव्य यह साबित करते हैं कि भारत आज वैश्विक स्तर पर काफ़ी मजबूत स्थिति में है। जहां उसके लिए अपना राष्ट्रीय महत्व साधना भी बेहद जरूरी है और वैश्विक परिदृश्य पर अपनी उपस्थिति भी सुदृढ़ करना भी। यह तभी संभव है, जब देश सामंजस्य के साथ दुनिया के अधिकतर देशों के साथ आगे बढ़े।

भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा बाजार होने के साथ युवा शक्ति वाला देश है। जिसे देखते हुए भी दुनिया आशा भरी निगाहों से हमारे तरफ देख रही। वरना तुर्की ने रूस से एस-४०० खरीदा था तो अमेरिका ने कड़े प्रतिबंध लगा दिए वहीं जब भारत ने खरीदा तो अमेरिका ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। मोदी सरकार ने इस दौरान रूस और अमेरिका दोनों विरोधी देशों के साथ अपने रिश्तों में निकटता बनाए रखी है। जो भारतीय विदेश नीति का बड़ा कौशल है। आज भारत सामरिक और वैश्विक व्यापार के मामले में स्वतंत्र है। भारत की विदेश नीति आज दूरदर्शिता और मानवता से परिपूर्ण है। विश्व में भारत की बढ़ती साख बीते नौ वर्ष की कई महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक बड़ी उपलब्धि है।

महेश तिवारी