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व्यावसायिक उत्कृष्टता के प्रबल पक्षधर माणिकलाल शाह

ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में अब भी सबसे बड़ा अंतर है कि ग्रामीण इलाकों के ज्यादा लोग अभी भी ब्रांड को लेकर जागरुक नहीं हैं। जबकि शहरी इलाकों में लोग ब्रांड के नियमित उपयोगकर्ता हैं।

लेखक:

  • इस समय माणिक शाह ग्रुप यूनीलीवर के साथ वैश्विक वितरण का काम करता है। पूरे विश्व में जहाँ भी उनकी पहुँच नहीं हो पाती है वहाँ उनके उत्पाद पहुँचाना इनका काम होता है। सामान्यता यह एक ट्रेडिंग मॉडल है।
  • कंपनी की ग्रोथ को लेकर ग्रुप ने अभी जो वितरण का वैश्विक मॉडल यूनिलीवर के साथ मिलकर तैयार किया है वह काफी सफल रहा है। इससे बहुत सारी कंपनियाँ अब वह मॉडल अपनाना चाह रही हैं।

कहते हैं कि कठिनाई की परत कितनी ही सघन क्यों न हो, उसमें ही कहीं उम्मीद की डोर भी होती है। जो व्यक्ति उस डोर को थामे मेहनत करता है, उसे अंततः सफलता मिल ही जाती है। माणिक शाह ग्रुप के चेयरमैन माणिकलाल शाह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उद्योग जगत के इस सितारे की पृष्ठभूमि भी मुफ़लिसी से लडऩे-जीतने की रही है।

हालाँकि आज जो माणिक शाह ग्रुप अस्तित्व में है, उसे तैयार करने और संवारने का पूरा श्रेय माणिकलाल शाह को ही जाता है लेकिन इसमें उनके पूर्वजों का भी योगदान रहा है। दरअसल इस समूह का मूल नाम मूलचंदजी साह ग्रुप था जो इनके दादाजी ने बनाया था। वे लोग १९३२ में राजस्थान से मुंबई आए थे। पहले दो साल उन्होंने कटलरी शॉप में सर्विस की उस समय दो रुपए मासिक पगार थी। उस पगार में दिन भर कटलरी शॉप पर काम करना था और रात को अपने लिए और कटलरी मालिक के लिए खाना भी बनाना पडत़ा था। तो दिन की शुरुआत सुबह ६ः०० बजे होती थी और दिन खत्म होता था रात को १२ः०० बजे। इसके बावजूद भी जब उन्होंने देखा कि इससे ज्यादा ग्रोथ नहीं मिलेगी तो वे मस्जिद बंदर मार्केट में जाकर सामान खरीद कर ले आते थे और फिर थोक के भाव में लोगों को देते थे। इससे उनको मार्केटिंग का थोड़ा-थोड़ा अनुभव होने लगा और यूनीलीवर वालों की नजर उन पर पड़ी। उनको सबसे पहले यूनिलीवर ने १९३४ में होलसेलर बनाया। वहां से उन्होंने अपनी विकास यात्रा शुरू की। अब तो लगभग ९० साल की यात्रा हो गई है और यूनिलीवर के साथ इनका परिवार लगातार जुड़ा है। हालांकि, अब माणिकलाल यूनिलीवर के साथ अकेले रह गए हैं और बाकी सब अपने-अपने अलग व्यवसाय में चले गए हैं लेकिन इन्होंने वो विरासत अभी भी बनाए रखी है।

इस व्यवसाय में सक्रिय रूप से जुड़े हुए शाह को लगभग ४५ साल हो गए हैं और ग्रुप के लिहाज से देखा जाए तो ९० साल की यात्रा पूरी हो चुकी है। इस दौरान ग्रुप ने काफ़ी उतार चढ़ाव देखे हैं। माणिकलाल शाह एक बातचीत में अपनी इस यात्रा के बारे में दिलचस्प विवरण देते हैं। वो कहते हैं कि “हमने सर्फ बनाम निरमा का युद्ध भी देखा है जब निरमा ने एक नया मार्केट पैदा किया था। हमने देखा था कि कैसे हमारे पिताजी वो पहले आदमी थे जिन्होंने हिंदुस्तान यूनीलीवर को इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी तब अधिकांश लोगों ने उनके इस तुलना पर उनका उपहास उड़ाया था। वहीं ४ साल बाद जब पता चला कि सर्फ का सेल ३०ज्ञ्-४०ज्ञ् कम हो गया तब उनको लगा कि जो मूलचंद सेठ बोल रहे थे वो ही सही था और वही एक बात मेरे दिमाग में घर कर गई कि अनुभव आदमी को ज्यादा सिखाता है, किताबी ज्ञान केवल आपको एक रास्ता दिखाता है लेकिन उसके ऊपर चलते हुए खुद को चुनौतियों से गुजारना पडत़ा है।”

पेशेवर विस्तार

इस समय माणिक शाह ग्रुप यूनीलीवर के साथ वैश्विक वितरण का काम करता है। पूरे विश्व में जहाँ भी उनकी पहुँच नहीं हो पाती है वहाँ उनके उत्पाद पहुँचाना इनका काम होता है। सामान्यता यह एक ट्रेडिंग मॉडल है। उनसे ये उत्पाद खरीद लेते हैं और सीधे अपने ग्राहकों को भेजते हैं। इसके अलावा कोई भी कंपनी अपना उत्पाद लेकर आए और उसे भारत में बेचना चाहे तो ये उनकी मदद करते हैं।

हाल ही में इस ग्रुप ने खुद का ब्रांड डीवॉन भी लॉन्च किया है। इसमें ४ से १४ साल के बच्चों के समूह को लक्षित किया जा रहा है। ग्रुप ने अभी उनके लिए टूथ ब्रश बनाए हैं तथा उनके बॉडी वॉश, हैंड वॉश और शैंपू भी हैं। इन्होंनेडिजनी के साथ करार किया है, इसलिये ये उनके कैरेक्टर का उपयोग करके उत्पाद बनाते हैं, जिससे बच्चों में एक अलग ही उत्साह हो और वे उनसे खुद का जुड़ाव महसूस कर सकें। इस तरह काफी कुछ चल रहा है और कंपनी अब बड़े पैमाने पर इसे बढ़ा रही हैं और उसमें और भी ब्रांड एक्सटेंशन कर रही है।

इस संबंध में शाह कहते हैं “हमको डीवॉन सिर्फ बच्चों के लिए नहीं रखना है बल्कि पूरी फैमिली के लिए बनाना है। देशी उत्पाद होगा लेकिन आधुनिक प्रौद्योगिकी के साथ। हालाँकि विगत दो साल के कोविड पैंडेमिक ने हमें थोड़ा पीछे कर दिया था लेकिन अब फिर से रफ्तार पकड़ रहे हैं।

इसके अलावा ग्रुप ने एक शराब कंपनी में निवेश करना शुरू किया है और साथ ही ये एक शुगर फ्री ब्रांड इक्वल का सम्पूर्ण भारत में वितरण करते हैं। इसके अलावा यूनीलीवर के कुछ उत्पाद हैं, जिसके आयात की अनुमति इन्हें प्राप्त है। इसके अलावा देखें तो कुछ वर्षों पूर्व तक यह ग्रुप टैक्सटाइल और विनिर्माण क्षेत्र में भी कार्य रहा था लेकिन २००८ के वैश्विक वित्तीय संकट में काफी बड़ा नुकसान हुआ था इसलिए उसको बंद कर दिया गया। इस परिप्रेक्ष्य में श्री शाह एक रोचक बात कहते हैं, ”हालाँकि २००८ के बाद हमने ये भी देखा है कि जो सरकार से मदद टैक्सटाइल उद्योग को मिलनी चाहिए, वो वास्तव में नहीं मिल रही है। यह बात समझ से परे है कि जो क्षेत्र आय उत्पन्न करने के मामले में इतना आगे हैं और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार को समृद्ध कर सकता है सरकार उस पर ध्यान क्यों नहीं दे रही है? अपने से छोटा देश है बांग्लादेश, वह इस क्षेत्र पर हमसे ज्यादा ध्यान दे रहा है।”

एफएमसीजी सबसे तेजी से उभरते हुए सेक्टर के शीर्ष पाँच में शामिल एफएमसीजी क्षेत्र के बारे में श्री शाह का मानना है कि एफएमसीजी की विकास दर आगे भी शीर्ष पर ही बनी रहेगी क्योंकि अभी भी एफएमसीजी भारत में हर गाँव और छोटे-छोटे कस्बों तक समुचित रूप से पहुँची नहीं है। इसलिए उसका क्षेत्र अभी भी बहुत व्यापक है।

व्यवसाय और राज्य की नीतियों के संदर्भ में श्री शाह काफी संतुलित नजरिया रखते हैं। उनका मानना है कम हरेक योजना से फायदा मिलता है लेकिन भारत में विडंबना यह है कि किसी भी योजना के साथ हजारों उपनियम लगे होते हैं। योजनाएँ कभी भी सरल और सीधी नहीं होती। उदाहरण के लिए अगर आप कुछ नया कर रहे हैं लेकिन उपकरण कुछ साल पुराना उपयोग कर रहे हैं तो विशिष्ट योजना का फायदा आपको नहीं मिलेगा। कहने का अर्थ यह है कि आपको स्कीम के अनुसार बदलना पड़ेगा न कि स्कीम आपके अनुसार होगी। इसके अलावा हर चीज में कुछ न कुछ तकनीकी बाधाएँ होती ही हैं जिन्हें दूर किए जाने की बहुत जरूरत है। माणिकलाल शाह का विशेष आग्रह है कि जो भी निर्णयकर्ता हैं वो इस समस्या को देखें और इसे दूर करने के लिये प्रयास करें। साथ ही नियमों को सरल बनाया जाए ताकि लाभार्थियों तक योजना पहुँच सके।

भविष्य की योजनाएँ और शहर-गाँव

कंपनी की ग्रोथ को लेकर ग्रुप ने अभी जो वितरण का वैश्विक

मॉडल यूनिलीवर के साथ मिलकर तैयार किया है वह काफी सफल रहा है। इससे बहुत सारी कंपनियाँ अब वह मॉडल अपनाना चाह रही हैं और उन्होंने इसके लिए इनसे सम्पर्क भी किया है। जैसे अभी इनके पास गोदरेज वाले आए थे। शाह बताते हैं वे लोग भी चाह रहे हैं कि जहाँ भी हमें व्हाइट स्पेस मिले वहाँ हम उनके सारे के सारे उत्पाद यूनिलीवर के मॉडल पर बेचें।

व्हाइट स्पेस का मतलब जहाँ कंपनी पहुँच नहीं पा रही है या प्रोडक्ट उपलब्ध ही नहीं होता है। क्योंकि अभी यूनीलीवर की ही बात करें तो उनके साढ़े चार सौ अलग अलग उत्पाद हैं जो हरेक देश में उपलब्ध नहीं हो पाते। ज्यादा से ज्यादा पचास से सौ के बीच में उत्पाद ही हर देश में उनका उपलब्ध होता है। इससे बाकी की कंपनियों के लिए भी मौका रहता है। इसके अलावा एक स्थिति यह भी होती है कि बहुत सारी कंपनियों का अधिकांश देशों में न कोई ऑफिस होता है,न उत्पादन और न कोई रिप्रेजेंटेटिव होता है। तो वहाँ तक ये इनके वितरक के माध्यम से पहुँचते हैं।

इसके अलावा हाउस ओल्ड और पर्सनल केयर में पर्सनल केयर तो काफी तेजी से भारत में आगे बढ़ रहा है किंतु हाउस ओल्ड में गति अभी भी काफी धीमी है। इसकी एक वजह यह है कि लोगों में जागरूकता का अभाव है। मसलन कि हाउसहोल्ड में ये उपयोग करना चाहिए या नहीं जैसे एंटीबैक्टीरियल उत्पाद, जर्म्स क्लिरिंग इत्यादि। बड़े-बड़े शहरों में और बड़ी टाऊनशिप में लोग थोड़ी यात्रा वगैरह करते हैं तो वैश्विक मामलों के हिसाब से चीजों को जानते हैं लेकिन छोटे गांव और कस्बों में अभी तक इनका चलन ज्यादा नहीं है। तो जैस–जैसे शिक्षा और आय का स्तर बढ़ेगा तो हाउसहोल्ड भी काफी कुछ मजब़ूती दिखाएगा।

ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में अब भी सबसे बड़ा अंतर है कि ग्रामीण इलाकों के ज्यादा लोग अभी भी ब्रांड को लेकर जागरुक नहीं हैं। जबकि शहरी इलाकों में लोग ब्रांड के नियमित उपयोगकर्ता हैं। शहरी क्षेत्र में एक परिवार में पति, पत्नी और बच्चे सभी के लिए अलग अलग ब्रांड्‌स के उत्पाद होते हैं जबकि गांव में वैसा नहीं हो रहा है। गांव में कोई भी एक ब्रांड ले लिया तो पूरा परिवार वही उपयोग करता है। इसमें जागरूकता के अलावा मार्केटिंग और एडर्वटाइजिंग की भी कमी है, लेकिन अभी धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। मीडिया और इंटरनेट की पहुंच हर जगह होने से लोगों को पता चलने लगा है कि ब्रांड क्या होता है।

माणिकलाल शाह बताते हैं कि अभी-अभी हमने पिछले दो साल से वेयरहाउस शुरू किया है क्योंकि अब तक जो मॉडल था कि हम लोग थोक विक्रेता को पूरा का पूरा कंटेनर दे देते थे जो अमूमन एक ही उत्पाद का होता था लेकिन हर कोई उतनी क्षमता नहीं रखता है इसलिए हमने यह विचार किया कि पांच-छह अलग अलग उत्पादों को मिलाकर  अगर दिया जाए तो बिक्री काफी बढ़ जाएगी। इसलिए अब हम ये मॉडल चलाना चाह रहे हैं।

समाज सेवा में गहरी रुचि

कंपनी के स्तर पर यह बाध्यता तो है ही कि एक निश्चित सीमा की आमदनी के बाद उन्हें निगम सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के अंतर्गत सामाजिक विकास में निवेश करना ही होता है। हालाँकि कुछ लोग ऐसे हैं कि अच्छी खासी कमाई के बावजूद भी समाज सेवा नहीं करते हैं। शाह कहते हैं कि मैं इसे समाज सेवा के नजरिए से ही देखता हूँ। यह अच्छी बात है कि सरकार ने इसके लिए एक कानून ही बना दिया। हालाँकि, एक बात मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि हर बिजनेसमैन चोर नहीं होता है। वह अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को अछी तरह से निभाना जानता है।

सामाजिक कार्यों में अभी शिक्षा के क्षेत्र में इनके समूह द्वारा काफी कुछ कार्य किए जा रहे हैं । राजस्थान में  एक छोटा गांव है खीमेल। वहां १०० एकड़ लेकर लोगों ने उस जमाने में बालिका विद्यालय खोला था जिसका नाम मरुधर बालिका विद्यालय है। अभी इसमें बालिकाएं बीएड और बीए कर रही हैं। आज वहां पर समूह का एक हॉस्टल है जिसमें लगभग १००० लड़कियाँ रहती है और कुल क्षमता ४००० लड़कियों की है। इसके अलावा महावीर हॉस्पिटल है, वहां ये ट्रस्टी हैं। वो लगभग दौ सो बेड का अस्पताल है। वहाँ पर भी ये एक पैरामेडिकल कोर्सेज चलाते हैं। एक छोटी सी जैन बस्ती है। वहाँ पर एक ८५७ साल पुराना जैन मंदिर है जिसके जीर्णोद्वार का जिम्मा इस समूह के पास है।

एक सवाल कि राजस्थान से मुंबई आकर कई लोगों ने सफलता के परचम लहराए हैं, तो आप मुंबई और राजस्थान में ऐसा क्या कनेक्ट कर पा रहे हैं, जो दोनों राज्यों को जोडव़र रखा है, के जवाब में माणिकलाल कहते हैं- ”मुझे लगता है कि राजस्थान और मुंबई में जरूर कोई कनेक्शन होगा क्योंकि छत्रपति शिवाजी महाराज भी राजपूत घराने के थे और राजस्थान के भी ज्यादा से ज्यादा महाराजा सब राजपूत घराने से हुए हैं। हमारे जैन के सारे तीर्थंकर भी राजपूत घराने के हैं। तो लगभग-लगभग राजस्थान के लोगों की संस्कृति कुछ-कुछ महाराष्ट्र से मिलती जुलती है इसलिए लोग ज्यादा मुंबई की ओर आकर्षित होते हैं। वैसे मुंबई तो सपनों की नगरी है तो हर कोई मुंबई आना चाहता है। दूसरा कारण है कि राजस्थानी लोगों की खासियत यह होती है कि वे काफी मिलनसार स्वभाव के होते हैं, तो जहां भी जाते हैं जल्द से जल्द स्थानीय लोगों के साथ घुल मिल जाते हैं। साथ ही उनका जो एक परम्परागत स्वभाव होता है कि जिस समाज में वे रहते हैं वे उसके विकास के बारे में सोचना शुरू कर देते हैं। यह भी एक कारण है कि मैं दोनों राज्यों के बीच संबंध स्थापित कर पाता हूँ।

नई पीढ़ी के ग्रोथ लीडर्स

भारतीय उद्योग जगत में एक नहीं बल्कि तमाम ऐसे बड़े उद्योग घराने हैं जो भारत के साथ -साथ  दुनिया के अन्य देशों में भी सफलता के परचम लहरा रहे हैं। मुकेश अम्बानी, कुमार मंगलम बिड़ला, गौतम अडानी तथा नादिर गोदरेज जैसे लोगों ने देश में विभिन्न प्रकार के उद्योग-धंधे स्थापित कर लाखों लोगों को रोजगार का अवसर दिया है। इन लोगों ने विरासत में प्राप्त व्यवसाय को पूरी निष्ठा, कुशलता और उम्दा नेतृत्व शैली के साथ व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया। मुकेश अम्बानी से लेकर गौतम अडानी तक, सभी उद्यमियों ने समय – समय पर अपने औद्योगिक साम्राज्य की प्रगति और सुरक्षा की दृष्टि से संकटमोचन की भूमिका निभाई है। मौजूदा वक्त में जब इन उद्योग घरानों के बच्चे व्यावसायिक जिम्मेदारी संभालने के काबिल हो गए हैं तो उनके अभिभावक भी उन्हें बड़ी उम्मीदों के साथ बिजनेस की कमान सौंप रहे हैं। भारत अपने विकास के बेहतरीन दौर से गुजर रहा है, पूरी दुनिया की नज़र हम पर है। ऐसे में बिजनेस की नई पीढ़ी के कन्धों पर भारत के आर्थिक विकास की बड़ी जिम्मेदारी है। इस विशेष लेख में हमने नई पीढ़ी 5 दिग्गज बिजनेस लीडर्स की नेतृत्व शैली और कृतित्व – व्यक्तित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डाला है, जिनमें करण अडानी, आर्यमन बिड़ला, बुर्जिस गोदरेज, मानसी किर्लोस्कर और वैष्णव शेट्टी शामिल हैं।

बिजनेस के मैदान में ऑलराउंडर

क्रिकेट के मैदान से बिजनेस के पिच पर उतरने वाले आर्यमन बिड़ला देश के दिग्गज उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला के बेटे हैं। एक तरह से आर्यमन ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया है, ऐसे में फैमिली बिजनेस ज्वाइन करना उनके करियर की दूसरी पारी कही जा सकती है। प्रतिष्ठित बिड़ला परिवार की 5वीं पीढ़ी के वंशज आर्यमान विक्रम बिड़ला के पास व्यवसाय निर्माण, वीसी निवेश और पेशेवर खेल का समृद्ध और विविध अनुभव है। वह फैशन और रिटेल, रियल एस्टेट और पेंट्‌स सहित आदित्य बिड़ला समूह के कई व्यवसायों से व्यापक स्तर पर जुड़े हैं। अपने पिता कुमार मंगलम बिड़ला के कुशल मार्गदर्शन में आर्यमन न्यू एज बिजनेस में काम करने को लेकर काफी उत्साहित हैं।

आर्यमान ग्रुप के वेंचर कैपिटल फंड, आदित्य बिड़ला वेंचर्स का भी नेतृत्व कर रहे हैं, जिसने पहले से ही पांच हाई – ग्रोथ स्टार्टअप्स में निवेश किया है। वर्तमान में, वह आदित्य बिड़ला मैनेजमेंट कॉरपोरेशन (पी) लिमिटेड, ग्रुप की एपेक्स बॉडी, ग्रासिम इंडस्ट्रीज और आदित्य बिड़ला फैशन एंड रिटेल लिमिटेड के बोर्ड में निदेशक हैं। इसके साथ ही, आर्यमान एटलस स्किलटेक यूनिवर्सिटी के सलाहकार बोर्ड में भी शामिल हैं।

आदित्य बिड़ला समूह में शामिल होने से पहले, आर्यमान बिड़ला प्रथम श्रेणी के शानदार क्रिकेटर थे। वह २०१७ में भारत के सबसे ज्यादा अंडर-२३ रन बनाने वाले खिलाड़ी थे। उसके एक साल बाद, आर्यमान ने भारत के प्रमुख प्रथम श्रेणी टूर्नामेंट रणजी ट्रॉफी में मध्य प्रदेश के लिए यादगार शतकीय पारी खेली थी। उन्होंने आईपीएल में राजस्थान रॉयल्स का भी प्रतिनिधित्व किया था।

बिजनेस में बंटा रहे पिता  का हाथ

करण अदानी, अदानी पोट्‌र्स एंड एसईजेड लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। वह वर्तमान में अपने ग्राहकों के लिए मूल्यवर्धन के उद्देश्य से एक एकीकृत लॉजिस्टिक कंपनी बनाने के लिए अदानी पोट्‌र्स एंड एसईजेड लिमिटेड में आवश्यक रूपांतरण का नेतृत्व कर रहे हैं। झ्ल्ी्‌ल यूनिवर्सिटी, यूएसए से अर्थशास्त्र में स्नातक की शिक्षा पूर्ण करने वाले करण वैश्विक दृष्टिकोण के साथ तकनीकी दक्षता रखते हैं और व्यवसाय के सभी क्षेत्रों में उच्चतम मानक स्थापित करने में विश्वास करते हैं। उन्होंने अदानी पोट्‌र्स एंड एसईजेड लिमिटेड की विकास रणनीति को सफलतापूर्वक आगे बढय़ा है, जिसके परिणामस्वरूप शुरुआत के दो बंदरगाहों की तुलना में दस बंदरगाहों और टर्मिनलों तक इसका तेजी से विस्तार हुआ है।

इसके अलावा करण अडानी अंबुजा सीमेंट्‌स और एसीसी लिमिडेट की की भी जिम्मेदारी संभालते हैं। अम्बुजा सीमेंट्‌स में वह निदेशक की भूमिका में हैं। वहीं एसीसी लिमिटेड में करण चेयरमैन पद पर नामित हैं। एसीसी सीमेंट्‌स के अब तक के इतिहास में वह सबसे यंगेस्ट चेयरमैन हैं। बिजनेस रिपोट्‌र्स की मानें तो करण अडानी की अगुवाई में अंबुजा सीमेंट्‌स और एसीसी दोनों को अडानी इन्फ्रास्ट्रक्चर प्लेटफॉर्म के साथ तालमेल से विशेष लाभ होगा। खासकर कच्चे माल, अक्षय ऊर्जा और लॉजिस्टिक के क्षेत्र में अडानी ग्रुप को महारथ हासिल है, क्योंकि अडानी ग्रुप की कंपनियों के पास इन कामों को लेकर व्यापक अनुभव है। अम्बुजा सीमेंट्‌स और एसीसी सीमेंट्‌स के अधिग्रहण के बाद अडानी समूह देश का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट मैन्युफैक्चरर बन गया है।

महाराष्ट्र सरकार ने प्रदेश की आर्थिक सेहत सुधारने के लिए आर्थिक सलाहकार परिषद्‌ (र्िींंण्) का गठन किया है, इस कॉउंसिल में करण को भी शामिल किया गया है। करण बहुत ही कर्मठ, दूरदृष्टि सम्पन्न योजनाकार और रणनीतिकार हैं। प्रबन्धन के उच्च गुणों से परिपूर्ण उनका व्यक्तित्व अदानी समूह की प्रगति में उत्तोत्तर सहायक है। हाल ही में अडानी समूह के सामने आये संकट के समय जिस तरह करण अडानी ने पूरी क्षमता और गंभीरता के साथ अपनी बेहतरीन लीडरशिप का परिचय दिया, वह अपने आप में अत्यधिक प्रशंसनीय है। अपने पिता की तरह करण भी हमेशा एक परिपक्व बिजनेस लीडर नज़र आते हैं। करण अपने पिता के साथ कंधे से कन्धा मिलाते हुए अडानी ग्रुप को बिजनेस की ऊँचाइयों पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उद्योग जगत का उभरता सितारा

र्जिस गोदरेज, भारतीय उद्योग जगत के एक ऐसे उभरते हुए सितारे हैं जो बिजनेस लीडर्स ही नहीं बल्कि युवाओं के लिए भी प्रेरक प्रसून हैं। वह प्रतिभाशाली लोगों को आगे बढ़ने में हर तरह से मदद करते हैं। बहुत ही कम समय में उन्होंने प्रभावी लीडरशिप और कार्यकुशलता के माध्यम से उद्योग जगत की नई पीढ़ी में अपनी विशेष पहचान बना ली है। बुर्जिस स्वभाव से शांत प्रवृत्ति के हैं लेकिन कारोबार के प्रति उनकी पूरी निष्ठा है। वह जो भी काम हाथ में लेते हैं, उसमें अपना १०० प्रतिशत योगदान देते हैं। यही वजह है कि अब तक जहां भी बुर्जिस ने काम किया है, वहां अपने वर्टिकल या सेक्टर को सफलता की नई ऊंचाइयों पर ले जाने का काम किया है।

पिछले साल गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) ने बुर्जिस गोदरेज को कंपनी का कार्यकारी निदेशक नियुक्त किया था। वर्तमान की बात करें तो इस वक्त बुर्जिस, गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड में विशेष परियोजनाओं के प्रमुख हैं, जहां वे नई योजनाओं और नए व्यवसाय विकास के लिए विभिन्न प्रभागों के बीच परियोजनाओं के समन्वय संभालते हैं। अपने पिता नादिर गोदरेज से बिजनेस की शुरुआती समझ लेने के बाद बुर्जिस ने हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से २०२१ में एमबीए की पढ़ाई की।

गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड को कृषि उद्योग के क्षेत्र में सबसे आगे बनाने में बुर्जिस गोदरेज का काफी योगदान रहा है। बुर्जिस की दूरदृष्टि और रणनीति के आगे अन्य कंपनियां पीछे रह गयीं। बुर्जिस ने २०१७ में गोदरेज एग्रोवेट जॉइन किया था जिसमें उन्हें रणनीति प्रभाग में नए उत्पाद विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। गोदरेज एग्रोवेट शामिल होने से पहले वह किसानों को सॉफ्टवेयर प्रदान करने वाली कंपनी कंजर्विस कॉर्पोरेशन के लिए काम करते थे। यहां सॉफ्टवेयर के कार्यान्वयन, कस्टमर सक्सेस, पानी की क्वालिटी चेक करना और सेल्स में उन्नति की जिम्मेदारियां बुर्जिस गोदरेज पर थीं। सेल्स, गुणवत्ता, नए विचारों का सफलतापूर्वक कार्यान्वयन, कस्टमर को सही उत्पाद बेचना और कस्टमर के साथ ही कंपनी के फायदे पर काम करना, व्यापार के इन रणनीतियों के साथ बुर्जिस गोदरेज ने कम समय में बड़ा अनुभव हासिल कर लिया है।

बुर्जिस भारत के डेयरी प्रोडक्ट के व्यापार को बढ़ाने पर भी काफी जोर देते हैं। उनका मानना है कि भारत में डेयरी फार्मों का विखंडन एक बड़ी समस्या है। डेयरी फार्म छोटे हैं और प्रति गाय दुग्ध उत्पादन अन्य देशों की तुलना में कम हैं। ऐसे में बड़े डेयरी फार्मों को बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था में योगदान बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है। इससे मवेशियों के लिए आनुवंशिक सुधार पर काम करना, पशु स्वास्थ्य और पोषण को बढ़ावा देने से डेयरी कंपनियों को लॉजिस्टिक क्षमता पैदा करके विस्तार करने में मदद मिलेगी।

भविष्य में गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड के विस्तार के प्लान पर बुर्जिस गोदरेज का मानना है कि कंपनी तालमेल वाले आस-पास के क्षेत्रों में विस्तार करने और अधिग्रहण करने पर विचार कर रही है। कंपनी अपने अनुसंधान एवं विकास विभाग को और विकसित करने पर काम कर रही है। इतना ही नहीं गोदरेज एग्रोवेट, डिजिटलीकरण पर भी मजबूती से आगे बढ़ रही है। कंपनी थिंकएज का हिस्सा है जो कृषि स्टार्टअप को उद्योग के साथ सहयोग करने के लिए जोड़ता है। इस प्रोग्राम के जरिए कंपनी बायोटेक और डिजिटल नवाचार के जरिए किसानों और उपभोक्ताओं की बदलाव की जर्नी में उनके साथ होगी।

सन्नी कुमार

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