पहले बिजनेस में तकनीक थी अब तकनीक में बिजनेस है

लंबी दौड़ के शौकीन एन. चंद्रशेखरन कई मैराथन में हिस्सा ले चुके हैं। पद्मभूषण से सम्मानित हैं, फोटोग्राफी का शौक भी रखते हैं। लेकिन इसके अलावा उनका सबसे बड़ा परिचय है कि वह देश की दिग्गज कंपनी टाटा संस बोर्ड के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन भी हैं। टाटा ग्रुप के साथ उनका नाता पिछले 3 दशक से है। साइरस मिस्त्री के बाद उन्हें टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया। वह तमिलनाडु के इंजीनियरिंग कॉलेज से कंप्यूटर ऐप्लिकेशन में मास्टर्स की डिग्री लेने के बाद टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज में शामिल हुए। यहां पेश हैं उनके एक भाषण का संपादित हिस्सा जिसमें उन्होंने आईआईटी स्टूडेंट्स से बात करते हुए डिजिटल इकॉनमी पर अपनी राय जाहिर की है।

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म तकनीक की बात करें तो हर जगह डिजिटल शब्द की चर्चा सुनते हैं। कुछ लोग इसे चौथी औद्योगिक क्रांति भी कहते हैं पर यह उससे बेहद खास है। आमतौर पर देखें तो जब भी कोई तकनीकी सफलता मिली तो अर्थव्यवस्था में जबरदस्त विकास दिखा है क्योंकि इससे कई चीजें आसान या संभव हो जाती हैं। इससे हम नई दुनिया की कल्पना कर पाते हैं। भाप का इंजन आया तो यही हुआ, बिजली बनी तब भी। जनसंख्या बढ़ोतरी की तुलना में दुनिया की इकॉनमी जीडीपी के नजरिये से 10-12 गुना बढ़ गई। लेकिन पिछले 30-40 बरसों में कंप्यूटर और इंटरनेट आया तो आर्थिक विकास 37 गुना हो गया। अगर पीछे मुड़कर देखें तो 1950-60 में हम कहां थे? लेकिन डिजिटल के साथ बहुत-से रास्ते खुल गए।

ऐसा इसलिए क्योंकि बड़ी तादाद में टेक्नॉलजी सामने आती जा रही हैं। पहले अगर कोई तकनीकी क्रांति होती थी तो वह कई दशक तक रहती थी। लेकिन अब मैं नहीं जानता कि कितने युवाओं ने फैक्स मशीन देखी है क्योंकि 10-15 साल पहले हम फैक्स मशीनों की बात करते थे और उससे पहले टेलेक्स मशीनों की बात करते थे। यहां तक कि स्मार्टफोन और आईपैड भी एक दशक पुराना है। इसके साथ अब जो नई तकनीक आ रही हैं वे हर साल, दो साल या तीसरे साल की स्पीड से आ रही हैं। ये सब मिलकर एक-दूसरे की ताकत बढ़ा रही हैं।

 

बिजनस में हम प्रोसेस और डेटा की बात करते हैं। अधिकतर बिजनस पिछले कई दशकों में प्रोसेस पर फोकस करने की वजह से सफल हुए हैं। चाहे वह मैन्युफैक्चरिंग हो या सर्विसेज का क्षेत्र सब जगह ऐसा ही हुआ। लेकिन अब सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं हो रहा, यह बदलाव डेटा की ओर है। अब बिजनस के नजरिये से बदलाव हो रहा है। इसलिए हम ऐसे वक्त में जा रहे हैं जहां डेटा मैच्योरिटी पा लेंगे और इसके बाद बिजनस को स्थापित किया जाएगा। अब पुराने पैटर्न पर काम नहीं होगा, डेटा के रियल टाइम की जगह अनुमानित डेटा की प्रतिक्रिया से जुड़ा होगा।

मैं एक बदलाव और महसूस कर रहा हूं कि हम पहली बार यह भी देखेंगे कि तकनीक का सपोर्ट करने वाले बिजनस या बिजनस में तकनीक को शामिल करने की जगह हम नए बिजनस देखेंगे। कुछ ऐसे स्टार्टअप्स के बारे में हम सुन भी रहे हैं। यह मूल बदलाव है, बहुत सारे मौके मिलने वाले हैं। हम टेक्नॉलजी के इनोवेशन की बात नहीं है, हम बिजनस प्रोसेस के इनोवेशन की बात भी नहीं कर रहे, हम बिजनस मॉडल के इनोवेशन की बात कर रहे हैं। आप इसे हर बिजनस में देख सकते हैं। सफर में, होटलों में, डिजिटल इंडस्ट्री की अपनी मार्केट वैल्यू है और यह असल इंडस्ट्री से कई गुना ज्यादा है।

यह आर्थिक मौका है, यही वैल्यू बनाना है और इससे बहुत सारी नौकरियां भी पैदा हुई हैं। इसे भारत के नजरिये से देखें तो यह सबसे बढ़िया वक्त है। हम दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कंस्यूमर इकॉनमी बनने जा रहे हैं। हमारे यहां तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। हमारी जीडीपी ग्रोथ दुनिया के कई देशों से ज्यादा है। एफडीआई में बढ़ोतरी हुई है, पहले देश में ज्यादातर निवेश एफआईआई के माध्यम से होता था। अब एफडीआई के माध्यम से अहम निवेश हो रहा है।

यह लगभग ऐसी स्थिति है जिसमें सितारे हमारे पक्ष में हैं। सरकार भी इसे बढ़ावा दे रही है। चाहे वह तकनीक अपनाने की बात हो या आर्थिक सुधारों की। इससे बहुत बड़े मौके मिलेंगे लेकिन साथ ही कुछ चुनौतियों की भी सामना करना होगा। हमारे लिए सबसे बड़ा मौका डिजिटल है क्योंकि हमारे पास युवा आबादी बहुत है और ये देश में बहुत तेजी से तकनीक को अपना रहे हैं। लेकिन साथ ही हमारी अनेक परेशानियां भी हैं। हम इंडस्ट्री को देखें, अगर हम हेल्थकेयर की बात करें तो हमारे पास अभी पर्याप्त अस्पताल नहीं हैं, डॉक्टर नहीं हैं। हमारे देश का डॉक्टर और मरीज का रेश्यो शायद दुनिया में सबसे खराब होगा। अगर आप शहरी भारत बनाम ग्रामीण भारत की बात करें तो अंतर साफ दिखेगा। एजुकेशन में टीचर और स्टूडेंट का रेश्यो बी समस्या है। स्कूलों में हमें करीब 4 लाख टीचर्स की जरूरत है। इसी तरह अलग-अलग इंडस्ट्री के आंकड़े देख सकते हैं। हमारे पास इस अंतर को खत्म करने के लिए पर्याप्त वक्त और पैसा नहीं है। 5 साल में हम 5 लाख डॉक्टर पैदा नहीं कर सकते। जितने टीचर्स की जरूरत है वे तैयार नहीं कर सकते। अगर किसी भी क्षेत्र को लें, हमें एक्सपर्ट्स की जरूरत है।

दूसरी तरफ हमारे पास ग्रैजुएट स्टूडेंट्स बहुत हैं। एक अनुमान है कि 1 करोड़ लोग हर साल तैयार हो जाते हैं। अगले 8-10 साल में हम करीब 10 करोड़ लोगों को इसमें जोड़ेंगे। इन सभी को नौकरी चाहिए। एक तरफ डिमांड है तो दूसरी तरफ जॉब की जरूरत भी है। हमें इस अंतर को पाटना होगा। यही चुनौती है। इनोवेशन और आंत्रप्रिन्योरशिप की जरूरत है। हमारी मांग थोड़ी अलग है। जब हम इनोवेशन कहते हैं तो रिसर्च की बात भी होती है। जैसे कैंसर को ठीक करने के लिए नई दवा खोजना आदि। हमारे देश में उसे गरीबों तक पहुंचाना भी जरूरी होता है।

हम उन लोगों तक पहुंचें जहां एक्सपर्ट नहीं पहुंच पाते। साथ ही एक्सपर्ट्स का दायरा बढ़ाना होगा चाहे अस्पताल हो या स्कूल। हम डिमांड को पूरा करने के योग्य हैं। यहीं से नए मौके पैदा होंगे। जरूरी नहीं कि ये मौके सिर्फ एक्सपर्ट्स को ही मिलें, यह रोजगार उन्हें भी मिलेगा जो कम स्किल रखते हैं या अलग-अलग चीजों की योग्यता रखते हैं। यही असली मौका होगा। एक तरफ हम रोजगार पैदा कर सकेंगे तो दूसरी तरफ इकनॉमिक वैल्यू भी हासिल करेंगे। इस तरह देश में बहुत सारे आंत्रप्रिन्योर तैयार हो सकेंगे।

 

 

 

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