जब लता दी ने कहा था राम तो स्वयं कविता हैं

जिंदगी के सबसे सुंदर दिन सबसे ज्यादा दुखदायी होते हैं, जब वो सिर्फ़ एक याद बन के रह जाते हैं । इक्कीस बरस पहले की बात है । मैं नया नया मुंबई आया था । काम की तलाश में था, गीत लिखना चाहता था । एक दिन अचानक मैंने अपने आपको एक स्टूडियो में पाया जहां मेरा लिखा हुआ गीत , साक्षात मां सरस्वती, लता मंगेशकर गा रही थीं । लता जी जैसी लेजेंड कोई गीत गाएं , इसके लिए जरूरी है कि बोल किसी बड़े गीतकार ने लिखे हों, मेरे जैसे स्ट्रगलर ने नहीं । पूछने पर पता चला कि उन्हें गीत के बोल पसंद आए, तो उन्होंने छोटा - बड़ा नहीं सोचा, बस गाने के लिए हां कह दिया । उनकी 'हां' ने मुझे मुंबई की मयानगरी में मेरा पहला गीत दे दिया। ये था मेरी यात्रा का शुभारम्भ ।

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स दिन जो मैंने महसूस किया, उसे लिख पाऊं, ऐसी क़लम में आज तक नहीं ढूंढ पाया । क्या लता मंगेशकर इतनी सहज हो सकती हैं कि रिकॉर्डिंग से पहले आधे घंटे तक चुटकुले सुनाएं ? इतनी निश्छल हो सकती हैं कि अपने चुटकुलों पर खुद ही ठहाके लगाएं और इतनी सरल हो सकती हैं कि मेरे जैसे मामूली आदमी को बग़ल में बिठाकर अपनी मनपसंद आइसक्रीम्स के नाम बताएं ? उस दिन मेरे कई भरम एक साथ चटक के टूट गए । मैंने तो बड़े लोगों के बारे में कुछ और ही सुना था , और जिसका क़द सबसे बड़ा था, वो तो कुछ और ही निकला । लता मंगेशकर सचमुच ‘कुछ और’ थीं । शब्दकोश का कोई भी विशेषण उन्हें पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकता, इसलिए मैं अपनी पराजय स्वीकार करते हुए ‘कुछ और’ जैसे साधारण वाक्यांश से संतोष करना चाहता हूं , कम से कम मेरे पढ़ने वाले ये तो जान जाएंगे कि लता जी का व्यक्तित्व और कृतित्व शब्द – सामर्थ्य से परे है ।
इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो बताकर मैं आपकी जानकारी में कोई वृद्धि कर सकता हूं । जो आप नहीं जानते, और सिर्फ वही लोग जानते हैं जिनको दीदी से मिलने का सौभाग्य मिला है, वो बताता हूं ।

लता जी के कदमों में दुनिया के सारे वैभव लोट रहे थे । ऐसी कोई इम्पोटेंड गाड़ी नहीं थी, जो वो ख़रीदना चाहें और न खरीद पाएं, कोई ऐसी जायदाद, कोई ऐसा ऐड्रेस नहीं था, जो उनकी पहुंच से परे हो । लेकिन जब कोई पहली बार उनके घर आता तो लता जी उसे सिर्फ दो चीजें दिखातीं, घर का वो कोना जहां उनके भगवान का मंदिर था और वो दीवार जिस पर उनके पूज्य माता – पिता का चित्र लगा हुआ था । लता जी बहुत पहले समझ गई थीं कि दुनिया में हासिल करने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन दिखाने के लिए इससे क्रीमती कुछ भी नहीं ।

ये तो कोई छुपी हुई बात नहीं है कि बड़ा कलाकार असीम और अनंत के साथ एक धागे में जुड़ा होता है । दीदी का ईश्वर से जुड़ाव बड़ा व्यक्तिगत और नितांत अपनेपन से भरा हुआ था । पिछले साल मई में उनका फ़ोन आया, कहने लगीं, मनोज जी एक गीत आपके साथ करना चाहती हूं । ‘ पहले तो मैं अपने सौभाग्य पर धन्य हुआ, फिर मैंने पूछा, ‘ दीदी, बताएं किस सब्जेक्ट पर लिखना है । ‘ दीदी बोलीं, राम पर ! मैंने कहा दीदी, राम पर लिखने के लिए तुलसीदास होना पड़ता है, मैं नहीं जानता कितना अच्छा लिख पाऊंगा, लेकिन कोशिश जरूर करूंगा । फिर दीदी ने जो कहा, वो आज तक मेरे कानों में गूंज रहा है- ‘ राम पर लिखना तो सबसे सरल है मनोज जी, उनका चरित्र तो स्वयं ही कविता है । ‘ मैंने गीत लिखा, दीदी को सुनाया, उन्होंने प्रशंसा की, लेकिन वो गीत कभी स्टूडियो तक नहीं पहुंच पाया । कालचक्र, इक्कीस साल पहले का वो दिन नहीं दोहरा पाया जब एक बार फिर दीदी स्टूडियो में हों, चुटकुले सुनाएं , बच्चों जैसी सरलता से हंसें और हंसाएं । इस साल वसंत पंचमी, सरस्वती पूजन के अगले दिन वीणावादिनी की ये सबसे लाड़ली बेटी अपनी मां के पास वापस लौट गई । “कहानी ख़त्म हुई और ऐसे खत्म हुई कि लोग रोने लग, तालियां बजाते हुए ।”

मैं निराशावादी नहीं हूं, लेकिन ये झूठी आशा भी नहीं रखता कि फिर कभी कोई लता मंगेशकर इस धरती पर जन्म लेंगी । ऐसे चमत्कार दोहराने में प्रकृति भी अक्षम है । दीदी को याद करके आज आंखें नम हैं, लेकिन मैं जीवन भर ये सोचकर मुस्कराता रहूंगा कि मेरी क़लम से निकले पहले गीत को लता मंगेशकर ने आवाज दी थी !

 

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